महासमुंद। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार की ढुलमुल रवैये आैर काम करने की ईच्छाशक्ति में कमी के चलते प्रदेश को मिलने वाली 5 नई मेडिकल काॅलेज को एनएमसी द्वारा मान्यता नहीं दिए जाने पर पूर्व संसदीय सचिव छ.ग. शासन व महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने इसे भाजपा सरकार की अक्षमता व लापरवाही का नतीजा कहा है। श्री चंद्राकर ने कहा कि नेशनल मेडिकल कमीशन द्वारा दंतेवाड़ा (गीदम), मनेंद्रगढ़, कुनकुरी (जशपुर), जांजगीर-चांपा और कवर्धा में प्रस्तावित 5 नए मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने से साफ इनकार करना सरकार के लिए अत्यंत शर्मनाक है।
श्री चंद्राकर ने कहा कि पूर्व में कांग्रेस सरकार के समय उनके विधायकी कार्यकाल में महासमुंद के मेडिकल कॉलेज को शुरू कराया था। साल दर साल एनएमसी के मापदंड अनुरूप शर्तों को पूरा कर रात-रात भर बैठकर अनुमति दिलाई जाती थी। एमबीबीएस सेशन की परमिशन के लिए एनाटॉमी डिपार्टमेंट में बॉडी की कमी के कारण शिक्षा सत्र की अनुमति न रुके इसलिए श्री चंद्राकर ने स्वयं 25000 रुपए राशि खर्च कर बॉडी की व्यवस्था कराई थी। अपने विधायक निधि से उन्होंने 25 लाख रुपए तत्काल प्रदान कर फर्नीचर डिसेक्शन हॉल, लेक्चरर थियेटर, लाइब्रेरी सेटअप, लैब इक्विपमेंट आदि की व्यवस्था कराई, वहीं स्टाफ की कमी की वजह से शिक्षा सत्र की मान्यता पर समस्या न आये इसके लिए एक निजी होटल में डॉक्टरों की रुकने की व्यवस्था की। उन्होंने कहा कि यदि नीयत साफ हो और मेहनत की जाए तो सब संभव है। भाजपा सरकार के पास न नीयत है, न मेहनत करने का जज्बा। सरकार की लापरवाही के कारण 250 सीटों का नुकसान हो गया। इन कॉलेजों से 250 नई एमबीबीएस सीटें मिलनी थीं, जिससे नीट के छात्रों को राहत मिलती। अब यह सपना टूट गया। बिना तैयारी के प्रस्ताव भेजने का हाल यह हुआ। न अस्पताल भवन तैयार थे, न कॉलेज बिल्डिंग बनी, न फैकल्टी की भर्ती हुई। कई जगह तो जिला अस्पताल तक नहीं है। फिर भी सरकार ने अधूरे ढांचे के साथ एनएमसी को प्रस्ताव भेज दिया। यह युवाओं के भविष्य से सीधा खिलवाड़ है।
श्री चंद्राकर ने कहा कि चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भरोसा था कि “सरकारी कॉलेज है तो मान्यता मिल ही जाएगी”। एनएमसी ने 2023 से तय पैरामीटर पर जांच की और सारे आवेदन खारिज कर दिए। प्रदेश में सीनियर रेजिडेंट के 72% और असिस्टेंट प्रोफेसर के 56% पद खाली हैं। 296 डॉक्टर प्रमोशन का इंतजार कर रहे हैं। जब मौजूदा कॉलेजों में ही स्टाफ नहीं, तो नए कॉलेज कैसे चलेंगे? एनएमसी ने 10 जून तक कमियां दूर करने को कहा था, लेकिन सरकार सोती रही। एफिलिएशन सर्टिफिकेट तक नहीं भेजा गया। श्री चंद्राकर ने कहा कि जब बुनियादी ढांचा, फैकल्टी और उपकरण नहीं थे तो बिना तैयारी एनएमसी को प्रस्ताव क्यों भेजा गया? क्या दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों दंतेवाड़ा, कुनकुरी के बच्चों को डॉक्टर बनने का अधिकार नहीं है? मौजूदा 10 मेडिकल कॉलेजों में हॉस्टल, मेस, भवन की सुविधा तक नहीं है। उनकी सुधार की दिशा में भी सरकार की विशेष रूची नहीं दिखती। श्री चंद्राकर ने कहा कि इस पूरी लापरवाही की उच्च स्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। सरकार श्वेत पत्र जारी करे कि एनएमसी के 99% मानक पूरे करने का दावा झूठा क्यों निकला। युद्ध स्तर पर कमियां दूर कर एनएमसी में अपील की जाए और इसी सत्र से कॉलेज शुरू कराने की दिशा में सार्थक पहल करें।



